शिमला : आईजीएमसी ब्लड बैंक में नरेश शर्मा ने किया 125वां रक्तदान, युवाओं के लिए बने प्रेरणा-स्रोत
पिछले तीन दशकों से रक्तदान की उत्कृष्ट सेवाएं देने वाले हिमाचल प्रदेश के रक्तदाता नरेश शर्मा ने 24अगस्त 2025 को जिला शिमला के IGMC ब्लड बैंक में अपना 125वां स्वैच्छिक रक्तदान किया।
यह केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि त्याग, करुणा और जन-सेवा की अनोखी यात्रा है जिसने बीते तीन दशकों से समाज को प्रेरित किया है।
सेवा का अनोखा पर्व
मानव सेवा का सबसे बड़ा कर्म — रक्तदान हैं। जब कोई व्यक्ति अपनी इच्छा और निस्वार्थ भावना से जीवनदायी रक्त दान करता है, तो वह न केवल एक जरूरतमंद की जान बचाता है बल्कि एक पूरे परिवार को नई उम्मीद और खुशियाँ भी प्रदान करता है। इसी सेवा और त्याग का महापर्व पिछले कल तब दिखा जब हिमाचल प्रदेश के स्वेच्छिक रक्तदाता नरेश शर्मा ने राजधानी शिमला के आईजीएमसी ब्लड बैंक में अपना 125वां स्वैच्छिक रक्तदान किया।
अनोखी यात्रा का आरंभ
जिला शिमला की तहसील ठियोग की ग्राम पंचायत सरिवन के छोटे से गांव मझोली के रहने वाले नरेश शर्मा एक साधारण ग्रामीण परिवेश से निकलकर राष्ट्र और समाज के लिए प्रेरणा बने हुए हैं। तीन दशक पहले कॉलेज के दिनों में शुरू हुई नरेश जी की यह यात्रा आज जनसेवा का अनुपम उदाहरण बन चुकी है। 18 वर्ष की आयु में, शिमला में हुए एक बस हादसे के बाद, पहली बार उन्होंने रक्तदान किया। उस समय सोशल मीडिया तो दूर, मोबाइल तक का प्रचलन नहीं था। मदद की पुकार केवल शहर की भीड़ वाली दीवारों पर पोस्टर लगा कर की जाती थी। उस समय जब घायल मरीज के लिए उनका रक्त जीवनरक्षक बना और तभी से यह संकल्प लिया कि "जीवनभर रक्तदान को मिशन बनाउंगा।
नरेश शर्मा जी के रक्तदान की यात्रा केवल हिमाचल प्रदेश तक सीमित नहीं रही बल्कि उन्होंने अब तक देश के लगभग 21 राज्यों में रक्तदान कर मानवता की सेवा की है। इनकी इस सेवा-यात्रा की सत्यता इतनी सशक्त है कि उनके पास 1 से लेकर 125 तक हर रक्तदान का प्रमाणपत्र आज भी सुरक्षित है। वे समाज में विशेष रूप से थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों के लिए अभियान चलाते हैं। ऐसे बच्चों को नियमित रक्त की आवश्यकता होती है, और हमेशा इसके लिए लोगों को जागरूक करते हैं ।
125वां रक्तदान – समाज के लिए ऐतिहासिक क्षण
24 अगस्त का दिन इस यात्रा का गौरवपूर्ण पड़ाव बना, जब आईजीएमसी में उन्होंने 125वीं बार रक्तदान किया। वहां मौजूद डॉक्टरों, स्वास्थ्यकर्मियों और रक्तदाताओं की टीम ने इस क्षण को मानवता का उत्सव बताया। जिस प्रकार दीपक अपनी रोशनी दूसरों में बांटकर स्वयं उज्ज्वल रहता है, वैसे ही एक रक्तदाता अपनी सेवा से समाज को रोशन करता है। इस मौके पर नरेश शर्मा ने युवाओं से सीधा संवाद करते हुए कहा की “दान के कई रूप हैं पर रक्तदान सबसे अनमोल है। क्योंकि यह न केवल जीवन बचाता है, बल्कि मनुष्य के भीतर मानवता और करुणा को भी जीवित रखता है। मेरा अनुभव है कि पहली बार रक्तदान करने में डर लग सकता है, लेकिन एक बार जब आप रक्तदान करते हैं और किसी का जीवन बचता है तो जो संतोष और गौरव मिलता है, वह शब्दों में नहीं बताया जा सकता।"
स्वास्थ्य और रक्तदान का रिश्ता
बहुत से लोग रक्तदान को लेकर कई भ्रांतियाँ पाले हुए रहते हैं। कुछ सोचते हैं कि इससे कमजोरी होती है या शरीर खराब हो सकता है। लेकिन नरेश शर्मा अपने जीवन के अनुभव से बताते हैं कि नियमित रक्तदान स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है। उनके अनुसार:
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रक्तदान से शरीर के हानिकारक तत्व बाहर निकल जाते हैं।
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हृदयघात और कैंसर जैसी बीमारियों का खतरा घटता है।
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शरीर में नई स्फूर्ति और ऊर्जा का संचार होता है।
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यही कारण है कि आज उनके कई मित्र अपने आप को स्वस्थ रहने के लिए रक्तदान को अपनी आदत बना चुके हैं।
जब दान का बखान जरूरी हो जाता है।
भारतीय संस्कृति में दान का बखान सामान्यतः उचित नहीं माना जाता। लेकिन शर्मा जी का स्पष्ट कहना है — “कभी-कभी बखान जरूरी हो जाता है। जब अपने ही माता-पिता को बच्चे रक्त देने से मना कर दें, जब किसी मरीज के साथ आये हुई उनके रिश्तेदार अस्पताल में रक्त पाने के लिये भटकते है। या जब थैलेसीमिया पीड़ित ऐसे बच्चे जिनका जीवन केवल रक्तदान पर ही निर्भर होता है उनके माता पिता अपने बच्चे का जीवन बचाने के लिए उम्र भर संघर्षरत रहते हैं … तब समाज को जागरूक करने के लिए अनुभव साझा करना आवश्यक हो जाता है।”
वे कहते हैं: “मुझे नहीं मालूम कि रक्तदान से कोई पुण्य मिलता है या नहीं, पर इतना निश्चित है कि यह विज्ञान पर आधारित सुरक्षित प्रक्रिया है। जिस से रक्तदान देने और लेने वाले दोनो का जीवन सुरक्षित होता है।
युवाओं और समाज के नाम संदेश
इस पर उन्होंने युवाओं और समाज के सभी वर्गों से यह आग्रह किया कि —
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यदि आप स्वस्थ हैं तो रक्तदान जरूर करें।
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यदि स्वयं रक्तदान नहीं कर सकते तो कम-से-कम जानकारी साझा कर दूसरों को प्रेरित करें।
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याद रखिए, आज तक रक्तदान से कोई नहीं मरा है, लेकिन रक्त न देने से अनेकों ने प्राण गंवाए हैं।
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कहते है - कि मैं ऊपरवाले और अपने सभी मित्रों, शुभचिंतकों का आभारी हूँ, जिनकी प्रेरणा से यह यात्रा निरंतर चल रही है। मेरा प्रयास सदैव रहेगा कि अपने राष्ट्र, प्रदेश और समाज के अधिकाधिक लोगों की सेवा कर सकूँ।


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