मकान का मौन संवाद

Sankalp Seva
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मकान का मौन संवाद

कस्बे की पुरानी गली में एक मकान खड़ा है—आज सुनसान, वीरान और खामोश। पर एक समय था जब यह दीवारें बोलती थीं, आँगन में बच्चों की किलकारियाँ गूंजती थीं, और रसोई से रोटियों की खुशबू मोहल्ले में फैलती थी।

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सन् 1970 की बात है। … गांव के स्कूल में एक अध्यापक थे, उनका नाम था राम लाल, उन्होंने बड़ी मेहनत से एक छोटी-सी ज़मीन खरीदी। उस जमीन पर अपना खुद का घर बना रहे थे। वे  अक्सर कहते थे, "घर ईंट-पत्थर से नहीं, संस्कारों से बनता है।" वह खुद रोज विद्यालय जाते, गांव के बच्चों को शिक्षा के साथ नैतिक संस्कार भी प्रदान करते, और उनकी पत्नी सावित्री देवी,  घर पर अपने बच्चों की देखभाल और परिवार की जिम्मेदारी सम्भालती थीं। दोनों ने मिलकर सपना देखा—एक छोटा और खुशहाल घर बनाने का।

उसके लिए ईंट दर ईंट, जोड़ते गए। बच्चों के नाम पर कमरों के कोने तय हुए। बरामदा इस तरह बनाया गया कि सुबह की धूप वहां सबसे पहले आए। घर बनते ही एक पूजा रखी गई। पूजा में गायत्री मंत्रों की गूंज से घर का हर एक कोना पवित्र हो उठा। गांव वालों के लिए भी गृह प्रवेश की खुशी में भोजन का आयोजन किया गया।

 नए घर की पहली रात ।

पहली रात, जब रामलाल परिवार समेत अपने नए घर में सोये, तो खुशी के मारे — उन्हें पूरी रात नींद नही आई। सावित्री देवी अब जब भी रसोई में खाना बनाती तो पहली रोटी बनाती गाय को बनाती। बच्चे दीवारों पर चॉक से घर-घर खेलते। घर, अब "मकान" नहीं रहा, वो "आत्मा" बन चुका था इस परिवार की।

समय बीतता गया। रामलाल के बच्चे बड़े हुए, पढ़ाई के लिए शहर गए। कोई नौकरी में, कोई विदेश। और एक दिन रामलाल भी भगवान को प्यारे हो गए।

संतानें अब इस घर को "पुराना" कहने लगीं। "इसमें क्या रखा है, बर्बाद ज़मीन है, बेचना चाहिए।" बातों-बातों में घर बिक गया। एक नया मालिक आया—वो व्यापारी था। उसने मरम्मत करवाई, रंग-रोगन कराया, पर आत्मा नहीं लौटी।

अब हर 8-10 साल में मकान का चेहरा बदलने लगा। कभी दुकान, कभी किराये का कमरा, कभी गोदाम। और अब… एक खंडहर। दरवाजे पर ताला लटका है, दीवारें झड़ रही हैं, छत टपकती है, पर वो मकान अब भी खड़ा है। शायद किसी को आज भी उसकी कहानी सुनाने की चाह है।

मकान का मौन संवाद

"लोग सोचते हैं कि मैं उनका घर हूँ,
पर सच ये है कि मैं किसी का नहीं होता।

कभी बच्चों की किलकारी से जिंदा था,
अब खामोश हूँ।
मेरे अंदर भगवान की पूजा भी हुई थी,
और अब मैं अँधेरे में डूबा हूँ।

मालिक आए, मालिक गए…
मैंने किसी को नहीं रोका।
हर कोई सोचता रहा कि ये ज़मीन उसकी है।
पर सच्चाई ये है—मैं अपना मालिक खुद बदलता हूँ।"

 जीवन का सत्य

इस मकान की कहानी हम सभी की है। हम सोचते हैं कि हम मालिक हैं—अपने घर के, अपने पैसे के, अपने शरीर के। पर समय सबका मालिक है। मकान की तरह, जीवन भी किराये पर मिला है।

लेकिन एक ही सत्य है वो है ईश्वर ।
ईश्वर को मत भूलिए। जो उन्होंने दिया, वो उनका है। जो हम जी रहे हैं, वो कृपा है। उनकी मर्जी से ही हम बने हैं, और एक दिन वहीं लौटना है।

ना घर तुम्हारा है, ना ज़मीन।
ना शरीर, ना तिजोरी।
अगर कुछ है तो सिर्फ कर्म—
जो तुम्हारे साथ ऊपर जाएगा।

दुनिया के सौ साल जी लिए, पर असहाय, पीड़ित के प्रति रखा गया सेवा भाव , ही स्वर्ग दिलाएगा।

इसलिए शान से जियो, पर ईश्वर को सदैव याद रखो
मकान भी बनाओ, पर उस मकान से पहले अपनी आत्मा के अंदर एक मंदिर बनाओ —
जो भूखे को रोटी दे, प्यासे को पानी,
दुखी को सहारा दे और भटके को रास्ता दिखाए।

वही सच्चा मंदिर है… और वही सच्चा मकान

  ✍️ लेखक: नरेश शर्मा ।। संकल्पसेवा ।। 2025

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